“लिज्जत पापड़” संघर्ष से लेकर सफलता की कहानी

“लिज्जत पापड़” संघर्ष से लेकर सफलता की कहानी

"लिज्जत पापड़" संघर्ष से लेकर सफलता की कहानी
“लिज्जत पापड़” संघर्ष से लेकर सफलता की कहानी

“लिज्जत पापड़” संघर्ष से लेकर सफलता की कहानी- लिज्जत पापड़ पहला भारतीय स्टार्ट-अप और वर्क फ्रॉम होम

आज भारत स्टार्ट-अप का बहुत बड़ा हब बनता जा रहा है क्या आपको पता है आज से लगभग 62 वर्ष पूर्व ही महाराष्ट्र के एक छोटे से इलाके साउथ मुम्बई में इसकी शुरुआत हो चुकी थी | ये भारत का पहला स्टार्ट-अप था जो महिलाओं के द्वारा स्टार्ट किया गया था जो आज महिला सशत्रिकरण का उत्तम उदाहरण है |

आज से लगभग 62 वर्ष पूर्व पंद्रह मार्च उन्नतीस सों उन्सठ को इस स्टार्ट-अप की स्थापना हुई था |

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जी हाँ हम बात कर रह है लिज्जित पापड़ की | लिज्जित का मतलब होता है “टेस्टी”

एक मकान की छत पर सात महिलाओं ने इसकी शुरुआत की, उन सात महिलाओं ने एक ऐसा क्रन्तिकारी काम किया जो आज एक मिसाल बन गया | पहले दिन इन सात महिलाओं ने पचास पैसे की इनकम की और आज लगभग अठारह करोड़ प्रति वर्ष हो गई है | ये सफलता रातों-रात नहीं मिली, काफी कठिन परिश्रम करना पड़ा तब जाकर ये मुकाम पाया, जस्वंती पोपट फाउंडर मेम्बेर्स है |

ये सात महिलाये आज पचास हज़ार हो गई है जिन्होंने लिज्जित पापड़ को ऐसा नाम बनाया है जिन्हें कई रार्ष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय पुरुस्कार मिल चुके है | इन्होने लिज्जित पापड़ एक कॉपरेटिव मूवमेंट बना दिया जिसमे एक बाद एक महिलाये जुड़ने लगी और आज ये लगभग पचास हज़ार है सभी की बराबर की भागीदारी होती है मतलब यदि फायदा होगा तो सभी का होगा और यदि नुकसान हुआ तो सबका होगा |

इससे हुआ ये कि सब महिलाओं ने मन लगाकर कार्य किया | इसमें जुड़ने लिए कोई जात, धर्म, शिक्षा, उम्र आदि का कोई का प्रतिबन्ध नहीं था | जो भी महिलाये खाना बना सकती थी वो शामिल हो सकती थी अर्थात जो ताकत महिलाओं के अन्दर छुपी हुई थी, उसको बाहर निकलने का मौका दिया ताकि उनकी इस स्किल को यूज़ किया जा सके था तथा महिलाओं को पैसा और सम्मान का मौका मिल सके, ये ही लिज्जित पापड़ संगठन का मोटिव था |

लिज्जत पापड़ के कार्य करने का तरीका बहुत सरल है, पापड़ बनाने के लिए दो पार्ट में किया जाता है, सेन्टर में आटा गुंथा जाता है और पापड़ बनाने का काम महिलाये अपने घर पर ही करती है | इससे होगा ये की महिलाये घर पर अपना घर का काम भी कर सकती थी और पापड़ बेलने का काम कर सकती थी |

इन महिलायों को “लिज्जत सिस्टर्स” कहा जाता है | इनको रोजाना घर से लाने और वापस घर पहुचाने के लिए बस की ब्यवस्था की गई है, सेन्टर में इनके पूर्ण सुविधा के लिए तीन स्टॉप या तीन खिड़कियाँ बनायीं गयी है |

पहला है जमा खिड़की- जिसमे कल लिया गुंथा आटा से बनाये गये पापड़ की जाँच करना और माप तोल करना फिर इन महिलायों को एक टोकन या पर्ची दी जाती है |

दूसरा है भुगतान खिड़की- इसमें महिलाये अपना रोजाना का मेहनताना ले सकती है, अमूमन एक महिला छ से सात सौ तक रोजाना कमा लेती है |

तीसरा है निकासी खिड़की- आज के लिए गुंथा आटा ले जाना ताकि उसका आज पापड़ बनाया जा सके और फिर इन सारी लिज्जत सिस्टर्स को वापस उनके घर पर पंहुचा दिया जाता है |

हर ब्रांच में एक संचालिका होती है जो अपने अंतर्गत आई की महिलाओं की पूर्ण जानकारी रखती है तथा उनको ट्रेनिंग और उपकरण (चकला बेलन) आदि ये उपकरण भी खास होता है जिसमे पापड़ का परीमाप, भार, आदि की पूर्ण जानकारी होती है ताकि किसी प्रकार की कोई ग़लती न हो और बीच -बीच में संचालिका अपने और कर्मचारियों के साथ महिलाओं के घर पर निरीक्षण को जाती है कि साफ-सफाई का, पापड़ सुखाने का सामान और स्थान आदि का सही से पलान हो रहा है या नहीं ताकि कस्टमर को पापड़ में कोई शिकायत न रहे |

आज भारत में लिज्जत पापड़ के ढाई करोड़ किलो पापड़ प्रतिवर्ष पुरे भारत में (सारी ब्रांच में) बनते है लेकिन स्वाद में में कही कोई अन्तर नहीं आता | इनकी लगभग 85 ब्रांच और 18 राज्यों तक फैला है ये ब्रांड, इतना अच्छा प्रोसिस बनाया, कही कोई स्टाफ में या कस्टमर में शिकायत नहीं |

धीरे धीरे इन्होने अपने को और बिल्ड किया आज लिज्जित पापड़ के रेडीमेड चपाती, वनस्पति आयल, मसाले, डिटरज़िंट, साबुन आदि बनते है आपने “ससा डिटरज़िंट” का नाम तो सुना ही होगा | ये अपने प्रोडक्ट में कम्प्रोमाइज नहीं करते, इनके पापड़ की हींग आज भी अफगानिस्तान से आती है ताकि स्वाद से समझौता नहीं, कालीमिर्च हो या उरद की दाल सब बेस्ट क्वालिटी से कोई कम्प्रोमाइज |

ये पूरी की पूरी संस्था आज भी मशीनरी का प्रयोग नहीं करती पापड़ बनाने में जब -जब बिज़नस को बढाने की बात हुई तो और महिलाओं को जोड़ा गया ताकि महिलाओं को रोजगार मिल सके मतलब लिज्जत सिस्टर्स को बढाया गया ना की मशीनरी को बढाया गया | यहाँ माडल ही ऐसा था की सबको रोजगार मिल सके अगर आज मशीनरी को बढाया जाता तो लिज्जत सिस्टर्स का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता इसलिए मशीनरी का कम से कम प्रयोग हो |

कई बार आप लोगो के मन में ये ख्याल भी आता होगा कि इतनी सारी महिलाये आपस में काम करती है तो इनके मध्य कोई लड़ाई या फालतू की गप- शप आदि भी हो सकती होंगी लेकिन इन्होंने शुरू से ही पोलिसी इतनी स्ट्रोंग बनायीं- जो भी महिला इनकी संस्था से जुडती है तो उसको एक फॉर्म (प्रतिज्ञा पत्र) दिया जाता है जिसमे सारी जानकारी होती है इस फॉर्म में सारे रूल्स, रेगुलेशन और इनफार्मेशन सब होता है तथा दोनों के अधिकारों की बात होती है (संस्था और कर्मचारी), इन्होने 0 प्रतिशत गोशिप और 100 प्रतिशत काम पर फोकस किया | काना-फूसी अलाउड नहीं है, जो कहना है सबके सामने कह दो सब कुछ ट्रांसपेरेंसी से हो क्युकी ये संस्था सबकी है, एक कॉमन विजिन भर दिया सबके मन में किये संस्था हमारी है और हम इसके है |

जस्वंती पोपट (फाउंडर मेम्बेर्स) अगर चाहती तो करोडो की संपत्ति कमा सकती थी लेकिन उनकी शुरु से ही ये मानसिकता थी कि हम उन हजारो- हजारो महिलाओं को अपने साथ जोड़ सके- उनको इम्पावर कर सके जिससे उनके गरीब बच्चे अच्छी शिक्षा ले पाए | आज कई लिज्जत सिस्टर्स के बच्चे IIT, IIM जैसे स्कूलों से शिक्षा ले रहे है |

शुरु से ही जब ये माडल में ग्रोथ होने लगी, तो इन्होंने सेल्स, मार्केटिंग, ब्रांडिंग, प्रोमोशन और अकाउंट एंड फाइनेंस पर ध्यान दिया गया | कई बार बड़ी बड़ी कम्पनियो ने दान देने की बात करी पर इन्होने कभी दान नहीं लिया बल्कि आपदा या अन्य विपदा में अपना सहयोग दिया | इनका एक उसूल है कि कभी कच्चे सामान को उधार नहीं लिया और न ही अपने रिटेलर को कभी उधार दिया, इसलिए इनका कैश-फ्लो कभी रुका नहीं और लिज्जत सिस्टर्स को भी डेली का डेली पेमेंट हो जाता था उनको अब महीने में सैलरी का इन्तजार नहीं रहता था |

जब कोई महिला अच्छा कार्य करती है तो बाद में उसको प्रमोशन करते हुए संचालिका बना दिया जाता है और फिर इसी प्रकार आगे चलकर इन ही संचालिकाओ में से इनके मुख्य ऑफिस में इक्कीस मेम्बेर्स की कमेटी बनाई जाती है जो पुरे देश की ब्रांचो की देखरेख करते है और ये मेम्बेर्स कोई भी हो सकती है कोई भेदभाव नहीं तो किसी प्रकार के घपले या पर्सनल बेनेफिट की संभावना नहीं होती क्युकी ये इक्कीस मेम्बेर्स सबकी राय कार्य को सम्पन करते है, आज भी सारे डिपार्टमेंट की वीकली, मंथली रिव्यु मीटिंग होती है

इन्ही इक्कीस मेम्बेर्स में से ही कोई प्रेसिडेंट, कोई वाईस प्रेसिडेंट बनता है याद रहे किये वो ही महिला है जो कभी पापड़ को बनाती थी और शिक्षा एवम मेहनत से आज प्रेसिडेंट तक बन सकती है |

अब बात आती है कि इस संस्था या संगठन का मकसद क्या है- मशीन के बदले मैन्पॉवर को बढाया जाय, केवल अपनी ग्रोथ को ही नहीं बल्कि पूरी कम्युनिटी की ग्रोथ की जाय, प्रॉफिट से ज्यादा रोजगार को बढाया जाय | ये एक महिला सशत्रिकरण का सफल माडल है, जो महिला कभी घर से बाहर नहीं निकली, अच्छी शिक्षा नहीं ली  आज वो अपने पैरो पर खड़ी है, एक मजदूर को मालिक बनाया

क्या से सब आसन है नही, अब कुछ बात आने वाले खतरे की भी बात कर लेते है जैसा की आपको पता है कि आज लगभग पचास हज़ार महिलाये इस मुहीम में जुडी है जहा आज भी काम मशीनरी से नहीं होता सब हाथ से ही होता है |

अब सोचिए अगर कोई बड़ा बिज़नस मेन एक बार के खर्चे में मशीनरी का प्रयोग करके अपना बिज़नस खड़ा कर दे तो उसको तो एक बार ही खर्चा आएगा और जहा पचास हज़ार महिलाओ का काम है वो पांच हज़ार महिलाओ के द्वारा ही कर लिया जायगा तो बाकि का क्या होगा | इसलिए अब लिज्जत पापड़ कॉपरेटिव मूवमेंट- सहकारिता को भी अपने काम और नजरिये को बदलना होगा क्युकी आज जमाना फिजिकल नहीं बल्कि डिजिटल हो रहा है सब का फोकस इनोवेशन, ऑटोमेशन और प्रोसेस ओरिएंटेशन पर है | अगर आगे स्केलेबल बनाना है ज़माने के इशारे को समझो, क्युकी अगर आगे बढना है तो टेक्नोलॉजी से हाथ मिलाना जरुरी है, जमाना और कॉम्पीटिशन बहुत बढता जा रहा है अगर अपने वजूद को बनाये रखना है तो इस बारे में भी ध्यान रखना होगा |