How to Start a Startup Given Interview to CNBC Startup Nation by Dr Vivek Bindra Sir

How to Start a Startup Given Interview to CNBC Startup Nation by Dr Vivek Bindra Sir

How to Start a Startup Given Interview to CNBC Startup Nation by Dr Vivek Bindra Sir
How to Start a Startup Given Interview to CNBC Startup Nation by Dr Vivek Bindra Sir

How to Start a Startup Given Interview to CNBC Startup Nation by Dr Vivek Bindra Sir- जितना हमारा देश पिछले 10 सालों में बदला है उतना 100 सालों में नहीं बदला होगा,

आज देश स्टार्टअप के लिए बहुत काम कर रहा है और लोगो की इन्करेज कर रहा है की आत्मनिर्भर बनो |

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एक सवाल है कि क्या किसी बिज़नस के एक अच्छा “आईडिया” जरूरी है या एक “मजबूत” इरादा और बहुत सारे अच्छे आईडियाज बिना इरादे के दम तोड़ देते हैं |

उत्तर है- आइडिया बहुत अच्छा भी हो, इरादा भी बहुत मजबूत हो तो भी चांसेस है कि आपका बिजनेस फेल हो जाएगा क्योंकि फंडामेंटली आपको क्या चाहिए |

अब विस्तार से बात करते है- आपको चाहिए कंजूमर कि वह बर्निंग प्रॉब्लम जिसको आप सॉल्व करें और जिसको कस्टमर आपके बिना खुद से सॉल्व ना कर पाए, अगर आप किसी भी बेस्ट ऑर्गेनाइजेशन को देखें जिसने मोनोपोली क्रिएट की है उसने दो प्रश्नों का उत्तर दिया है

पहला कस्टमर की बरनी प्रॉब्लम क्या है और

दूसरा कि उसको मैं कैसे सॉल्व करूं जो कस्टमर खुद से सॉल्व बना कर पाए

और जब ये दोनों कार्य हो जाये तो वहां से फिर उसको एग्जीक्यूट करने का समय है मतलब होता है, कई बार आप कोई प्रोडक्ट तो ले आते हो कस्टमर कहता है, प्रोडक्ट तो अच्छा है लेकिन मुझे इसकी जरूरत नहीं है सबसे पहले आप प्रॉब्लम को आईडेंटिफाई करें फिर उसका सलूशन ढूंढें, फिर आप यह देखें कि ऐसोल्यूशन आपसे कोई खरीदने को तैयार है |

उदाहरण से समझे कि आपने बहुत अच्छा खाना बनाया, आपने उस पशु (डॉग) को कहा कि खाना खा लो, मैंने बड़े प्यार से बनाया है, बहुत पैसा लगा है और बहुत पौष्टिक है आपके लिए, तो डॉग कहता है कि मुझे पसंद नहीं आया है यह खाना नहीं खाता मतलब मुह मोड़ देता है |

उसी प्रकार आपका कंजूमर का प्रॉब्लम नहीं सॉल्व करना उसका बर्निंग प्रॉब्लम सॉल्व करना है, समस्या नहीं ज्वलंत समस्या को सॉल्व करना है |

“जितना बड़ा प्रॉब्लम उतना बड़ी प्रीमियम”

आप खुद को कैसे आईडेंटिफाई कर सकते हैं कि मैं जो कर रहा हूं वह सही है-

नंबर एक- जब आप किसी की बर्निंग प्रॉब्लम को सॉल्व कर रहे हैं कहीं ऐसा तो नहीं है आप भी वही कर रहे जो और अन्य लोग करते हैं, वहां पर आपका कंजूमर एडवांटेज और कंपटीशन एडवांटेज दोनों साथ साथ चलेंगे कंप्लीटेड ऐसा ना हो कि आप भी वही प्रॉब्लम सॉल्व कर रहे हैं जो दूसरे करते आ रहे हैं |

नंबर दूसरा- जब सॉल्व करते वक्त आपको यह देखना है कि क्या मेरे बिजनेस में, मैं कितनी जल्दी और किस क्वांटम में पैसा रिकवर कर पाऊंगा, मैं जितनी इन्वेस्टमेंट्स में करने वाला हूं एक है नेगेटिव कैश फ्लो और दूसरा नेगेटिव मार्जन दोनों को संभालना बहुत जरूरी है |

बहुत से लोग अक्सर सक्सेसफुल स्टोरी को सुनकर खूब मोटिवेट हो जाते हैं, लेकिन इतना ध्यान रखना कि जब हजार लोगों ने उसको ट्राई किया था तो एक ही सफल होकर निकला उसको देखकर अपने को एक नेगेटिव मार्जन और नेगेटिव कैश-फ्लो वाले बिजनेस |

अब बात आती है कि जब इन्वेस्टर आएगा तो देखेगा आपके इसमें आप बिज़नस कंटिन्यूटी कितनी है, अगर आपके इसमें कौन ट्यूनिटी नहीं है जो लोग बार- बार कैसे खरीदेंगे |

एक और उदाहरण लेते हैं जैसे आपको अपने काम में जाने के लिए हम बेसिक चीज रेजर लेते है जो आप डेली यूज़ करते हैं या हम कोई ऐसा प्रोडक्ट बना रहे है जो आप दो साल या पञ्च साल में खरीदते हैं | अब यह देखना जरूरी है कि हमारा प्रोडक्ट कस्टमर के लिए ऑप्शनल है या कंपल्शन है |

नंबर तीसरा- फिर उसके बाद देखना है कि आपकी जो मार्केटिंग कंप्लेन है उसमें डिसाइडर कौन है मतलब इन्वेस्टमेंट करने वाला कौन है यानी कि आपका डिसीजन मेकिंग कौन है मतलब ऐसा ना हो कि आप जिसको माल बेच रहे हैं वह डिसाइड रही है ना हो और केवल अपना समय बर्बाद कर रहे है |

नंबर चौथा- कंजूमर के फीडबैक लेने की तैयारी करनी होगी, इसको बोलते “इंप्रूवमेंट साइकिल” अगर आप फीड-बैक की तैयारी नहीं कर रहे क्योंकि कस्टमर सिग्नल देता है एक अच्छी कंपनी या ब्रांड प्रोडक्ट बना देता है और जब कस्टमर सिग्नल देता है तो कमजोर ब्रांड उसको इग्नोर कर देता है, कस्टमर आपसे वही मांगेगा जो कोई नहीं दे सकता और अगर आपने वह दे दिया तो आपके बिज़नस ग्रो होना से कोई नहीं रोक सकता है |

अब बात करते है कि हमारा बिज़नस ग्रो होने के बाद अगर हमको की सहायता चाहिए तो कुछ पॉइंट आवश्य नोट कर ले कि इन्वेस्टर के पास जाने से पहले कुछ चीजों को इंपॉर्टेंट समझना है आपको एक जीव का जीवन दूसरे जीव पर निर्भर कैसे हो इसको बोलते “इकोसिस्टम” ताकि सब लोग मिलकर उस प्रॉब्लम को इवॉल्वर करें

जैसे हम फेसबुक का ही उदाहरण उठा ले वह प्रोडक्ट नहीं है प्रोजेक्ट है या प्लेटफार्म है उसी प्रकार एप्पल का आईओएस प्रोडक्ट नहीं है प्लेटफार्म है वह एक ऐसे इकोसिस्टम में है जहां दूसरे लोग आकर मेहनत कर रहे हैं जिसमें डिस्कनेक्टेड लोग कनेक्ट हो रहे हैं और कई अनकनेक्टेड लोग कनेक्ट हो रहे हैं |

जैसी आप समझे गूगल ने यूट्यूब नामक एक प्लेटफार्म बनाया है जिसमें लोग आकर अपने वीडियोस को शेयर करते हैं और कमाई करते हैं इसमें कंजूमर भी है, क्रिएटर भी है और एडवर्टाइज भी है और यू-ट्यूब खुद भी है मतलब ये हुआ कि इसमें सभी के लिए कुछ ना कुछ है, कोई विडियो क्रिएटर है जो वीडियोज बना रहा है तो कोई उसको कन्जूम कर रहा है और क्रिएटर को मेहनत का फल देने के लिए एडवर्टाइज भी मौजद है और इस प्लेटफार्म का ओनर यू-ट्यूब तो ही, इस इकोसिस्टम में सबका फायदा है तो निष्कर्ष ये है कि कोई ऐसा मॉडल हो जो सब के लिए फायदेमंद हो |

जैसा कहते हैं कि जुआ खेलने वाला पैसा नहीं कमाता, जुआ खिलाने वाला पैसा कमाता है

अगर हमको भी अपने बिज़नस को  ग्रो करना है तो बहुत महत्वपूर्ण है जिस प्रकार अकबर ने अपने नौ नवरत्न तैयार किये थे उसी प्रकार अपनी टीम को बिल्ड करना होगा लेकिन कई बार हम देखते है कि बहुत सारे छोटे बिजनेसमैन यही करते हैं वह अपने पुराने भरोसेमंद आदमी को ही आगे बढ़ाई जा रहे हैं चाहे उसमे समझ हो या ना हो |

अब बात करते है कि कई बार हम देखते हैं कि कुछ स्टार्टअप कुछ समय तो बहुत ग्रो करते हैं फिर एकदम डूब जाते हैं

इसका सबसे बढ़िया उत्तर है कि कोई भी बिज़नस में अगर इनोवेशन नहीं है अर्थात् जहा पर R&D नहीं होती वहा ग्रोथ नहीं हो सकती अगर हमको ग्रो करना है तो नए नए प्रोडक्ट लाने ही होंगे, आप महसूस करते होंगे की जो कम्पनी आज से 20 साल पहले जो प्रोडक्ट मार्किट में लाई थी उसमे उसने कितना परिवतर्न किया है और नए नए फिल्ड में भी उतर गई है |

कोई भी बड़ी कम्पनी एक प्रोडक्ट नहीं बनाती बल्कि नए काम करती है एक उदाहरण से समझते है कि टाटा सबसे पहले केवल गाड़िया ही बनाती थी लेकिन आज TCS- सॉफ्टवेयर बनाती है, तनिष्क में ज्वेलरी, FMCG में टाटा का नमक आदि कई नए प्रोडक्ट पर एक्स्पेंड कर चुकी है |   

जहां पर कोई भी कंपनी एक ही प्रोडक्ट में नहीं अटकी है बल्कि बहुत सारी नए सेक्टर में इंटर हो चुकी है, इसको बोलते इंप्रूवमेंट साइकिल

1-क्या अच्छा हुआ तथा 2-क्या गलत हुआ और 3-क्या हम सुधार कर सकते हैं, जो अच्छा या बुरा हुआ वह हमने देख लिया लेकिन अब हम क्या चेंज ला सकते हैं वह महत्वपूर्ण है इसको बोलते “नेक्स्ट न्यू बैटर”

प्रोडक्ट कंपटीशन को देखकर नहीं बनाते कस्टमर के सिग्नल को देखकर बनाते हैं कि कस्टमर क्या फीडबैक दे रहा है और क्या हम उस फीडबैक को फीड फोरवर्ड में कन्वर्ट कर सकते है

ये कुछ बेसिक थोट है किसी भी बिज़नस को आगे ले जाने के लिए